फिल्म पर राजनीति, अलविदा योजना आयोग

फिल्म पर राजनीति

बालीवुड फिल्म पीके के रिलीज होने के बाद उठे घटनाक्रम पर नजर डालें तो यह मामला पूर्ण रुप से राजनीतिक हो गया है। इस फिल्म को लेकर अब शुद्ध रुप से राजनीति शुरु हो गई है। सीधे तौर पर यह देखा जा रहा है कि इसका विरोध और समर्थन सिर्फ राजनीतिक कारणों से किया जा रहा है जोकि दुर्भाग्यपूर्ण है। कोई यह देखने और समझने की कोशिश नहीं कर रहा कि फिल्म का मूल उद्देश्य यह होता है कि वह लोगों का मनोरंजन करे, और मनोरंजन को सिर्फ मनोरंजन के चश्मे से देखा जाय। दूसरा यह कि मनोरंजन के साथ यदि कोई संदेश या विवाद है तो उस पर कुछ कहा और सुना जाय। लेकिन यहां पर सबकुछ विपरीत हो रहा है। एक तरफ जहां इस फिल्म का कुछ लोग विरोध कर रहे हैं वही उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारों ने इसे टैक्स फ्री करने का फैसला किया है। इस फैसले पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। क्या इन दोनों सरकारों को यह नहीं मालूम कि कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं और दूसरा यह कि यदि फिल्म इतनी अच्छी थी तो टैक्स फ्री करने का इरादा इतनी देर से क्यों आया? यह दोनों सरकारें अपने बचाव में चाहे जो भी दलीलें दें लेकिन उनके फैसले से एक बात तो साफ हो गई है कि हमारे नेता उन बातों के प्रति पर्याप्त संवेदनशील नहीं रहते जो हिंदू संगठनों को रास नहीं आती। उत्तर प्रदेश और बिहार सरकार के फैसले के बाद यदि पीके का विरोध कर रहे हिंदू संगठन और अधिक आक्रोशित हो जाएं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये। हम यहां न तो किसी का बचाव कर रहे हैं न ही किसी को उकसा रहे है, बल्कि एक संतुलित विश्लेषण करने की कोशिश कर रहे हैं। बावजूद इसके उचित यह होगा कि हिंदू इस फिल्म के विरोध में हिंसक तौर-तरीकों का परित्याग करें, वह अपनी बात को लोकतांत्रिक तरीके से ही रखें। हो सकता है कि इन दोनों सरकारों को इस फिल्म में कोई गूढ़ रहस्य नजर आता रहा हो, तो वह ठीक है। लेकिन इसके लिये वह जो तर्क दे रहे हैं वह समाज को बांटने वाला ही है। यूपी के मुख्यमंत्री ने कटाक्ष करते हुये कहा कि उन्होंने पीके फिल्म को टैक्स फ्री करने का फैसला इसलिए किया है ताकि जो लोग उसका विरोध कर रहे हैं वे भी उसे आसानी से देख सकें। यह बात यदि कोई नेता कहता तो समझ में आती। लेकिन प्रदेश सरकार के मुखिया की यह बात तो नाराज हिंदू संगठनों को भड़काने वाली बात हुई। अखिलेश को इस तरह के बयानों से बचना चाहिये। किसी भी चीज का विरोध और समर्थन एक सम्मानित दायरे में होना चाहिये। यदि किसी को कोई फिल्म पसंद नहीं आती तो वह उसका विरोध करे लेकिन शांतिपूर्ण ढ़ंग से, तोड़-फोड़ और हिंसा से नहीं। ठीक उसी प्रकार समर्थन भी मर्यादित तरीके से होना चाहिये किसी पर अनावश्यक टिप्पणी से कुछ नहीं हासिल होने वाला। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा है।

– गुरमीत सिंह

अलविदा योजना आयोग

काफी चर्चाओं के बाद योजना आयोग को अलविदा कह दिया गया है। योजना आयोग की बिदाई न तो अचानक है और न ही अप्रत्याशित। पिछले कुछ दशकों से किसी न किसी कारण से योजना आयोग हमेशा ही विवादों में रहा है। राज्य भी समय-समय पर योजना आयोग से नाखुशी जाहिर करते रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इसके रुपरेखा पर सवाल उठाये थे लेकिन कुछ बदलाव नहीं कर सके थे। इसीलिये जब लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भंग करने और इसकी जगह कहीं अधिक समायोजक संस्था बनाने का ऐलान किया तो किसी को कोई हैरानी नहीं हुई। योजना आयोग का गठन मार्च, 1950 में किया गया था। शुरुआती दशकों में योजना आयोग ने निश्चय तौर पर आधारभूत संरचना और आर्थिक विकास के मद्देनजर बेहतर काम किया, और तकरीबन चार दशकों तक इसने देश के विकास का खाका खींचने में अहम भूमिका निभाई। परंतु बाद में धीरे-धीरे यह अपनी प्रासंगिकता खोने लगा था, खासकर 1991 के बाद। यह वह दौर था जब देश में उदारीकरण का दौर शुरु हुआ था। योजना आयोग के साथ कमी यह रह गई कि देश में उदारीकरण और आर्थिक सुधारों का दौर तो शुरु हो गया लेकिन योजना आयोग में उस तरह के बदलाव नहीं किये गये जिसकी आवश्यकता थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि योजना आयोग ने देश को दर्जन भर पंचवर्षीय योजनाएं दीं, पर समय के साथ इसके तौर-तरीके में बदलाव नहीं किया गया। बल्कि समय के साथ ही साथ उसकी बैठकें केंद्र और राज्य तथा राज्यों के बीच के आपसी टकराव का सबब बनती गईं। कई बार वह कई अन्य कारणों से भी काफी विवादों में रहा। उदाहरण के तौर पर गरीबी की परिभाषा पर योजना की जितनी आलोचना हुई वह जगजाहिर है। योजना आयोग पर सवाल उठने की बड़ी वजह यह भी रही कि योजना आयोग राज्यों पर एक समानांतर केंद्रीय सत्ता की तरह नियंत्रण कर रहा था और उनकी नीतियों और योजनाओं को प्रभावित कर रहा था। केंद्र की सरकार अपना राजनीतिक हित साधने के लिये भी योजना आयोग का इस्तेमाल करने लगे थे। इसलिये कुल मिलाकर देखा जाय तो यह एक अच्छा कदम है।

– कृष्ण ध्यान त्रिपाठी

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