कुछ नहीं बदला, हवा में जहर

कुछ नहीं बदला

दो साल पहले दिसम्बर के ही महीने में दिल्ली की सड़कों पर निर्भया के साथ जो कुछ हुआ था उससे पूरा देश आक्रोशित हो उठा था। अब दो साल बाद एक बार फिर दिसम्बर के ही महीने में एक युवती के साथ एक नामी कैब कंपनी की टैक्सी में हुई दुष्कर्म की घटना यह बताती है कि हकीकत में दिल्ली की सड़कों पर कुछ भी नहीं बदला है। सारा सिस्टम जस का तस बना हुआ है। इन दो सालों में कानून बदल दिया गया। जनता ने दिल्ली और केंद्र में सरकारें बदल दीं लेकिन यह सरकारें दिल्ली की सड़कों को महफूज बनाने में पूरी तरह से असफल रही हैं। हलांकि इस तथ्य को नहीं नकारा जा सकता कि इस दूसरी घटना के बाद आरोपी को जल्दी पकड़ लिया गया। परंतु सवाल यह नहीं है कि आरोपी को जल्द पकड़ लिया गया बल्कि सवाल यह है कि दिल्ली की सड़कों पर महिलाओं की सुरक्षा के लिये क्या किया जा रहा है, और जो किया जा रहा है उसका प्रभावी असर क्यों नहीं दिख रहा है? इसका सबसे सीधा जबाब यह है कि महिला सुरक्षा को लेकर पुलिस महकमा बार-बार नकारा साबित हो रहा है। आम आदमी के लिये अब मुश्किल यह है कि जब नामी कंपनी की टैक्सी ही सुरक्षित नहीं है तो वह करे तो क्या करे। इसका समाधान प्रशासन को ढ़ूढना चाहिये। यह आश्चर्यजनक है कि कई देशों में अपनी सेवाएं देनी वाली कैब कंपनी उबर दिल्ली में अपनी सेवायें दे रही थी लेकिन इसकी कोई जानकारी पुलिस को ही नहीं थी। इस कंपनी के पास दिल्ली में टैक्सी चलाने का परमिट तक नहीं था। यह सोचकर हैरानी होती है कि एक कंपनी अपने प्रचार प्रसार के लिये हर तरफ विज्ञापन देती है लेकिन उसके पास उसके संचालन के लिये परमिट ही नहीं है, यह कैसे संभव हुआ इस पर विचार करने की आवश्यकता है। हम यहां पर किसी एक टैक्सी सेवा पर उंगली नहीं उठा रहे हैं, बल्कि हमारा सवाल सरकारी तंत्र से है कि वह अपनी तरफ से क्या कर रहा है? तकरीबन एक दशक होने को आ रहे है लेकिन तमाम दिशा-निर्देशों के बावजूद ऑटो और टैक्सियों में अभी तक जीपीएस सिस्टम लागू नहीं हो सका है। सन 2006 में रेडियो टैक्सी सेवा शुरु की गई थी। तब यह कहा गया था कि इससे लोगों को आसानी से टैक्सी मिल सकेगी और वह सुरक्षित तरीके से अपने गंतव्य तक पहुंच सकेंगे। लेकिन सरकारी तंत्र की कछुआ चाल का नतीजा यह है कि अब तक यह कार्य पूरा नहीं किया जा सका है। यह बड़ा ही शर्मनाक है कि एक तरफ जहां महिलाओं की सुरक्षा पर देश के प्रधानमंत्री जहां बार-बार जोर दे रहे हैं वही उनका ही सरकारी तंत्र इसको लेकर उदासीन बना हुआ है। दिल्ली की इस घटना से सरकारी तंत्र को सबक लेते हुये यह सुनिश्चित करना चाहिये कि राजधानी की सड़कों पर फिर से इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

– गुरमीत सिंह

हवा में जहर

सामान्यत: ऐसा माना जाता है कि सेहत के लिहाज से सर्दी का मौसम सबसे उत्तम होता है। सेहत के प्रति जागरुक नागरिक ठंड के बावजूद सुबह की सैर पूरे आनंद के साथ करते है। परंतु वायु प्रदूषण की एक रिपोर्ट ने लोगों को थोड़ा सा चिंचित कर दिया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली की हवा में प्रदूषण का जहर और बढ़ गया है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में सर्दियों में सुबह की हवा में, प्रदूषण में बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी हो जाती है। हवा में यह जहर स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदेह साबित होता है। रिपोर्ट के अनुसार प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक पार्टिकुलेट मैटर 2.5 है। पार्टिकुलेट मैटर बहुत ही छोटा कण होता है जिसमें कार्बन मोनोक्साइड, कार्बन डाईऑक्साइड इत्यादि तत्व होते हैं जिसके कारण यह हवा को प्रदूषित करते हैं। इस बात पर बहस की जा सकती है कि सरकार के आंकड़े कुछ और कहते हैं तथा संगठनों के आंकड़े कुछ और कह रहे हैं। परंतु दोनों आकड़ों में एक बात समान है। वह यह है कि दोनों के आंकड़े यह बता रहे हैं कि हवा में जहर घुल रहा है। इस रिपोर्ट के बाद सवाल यही उठता है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण क्यों बढ़ता जा रहा है और इसको रोकने के लिये सरकार की तरफ से क्या कदम उठाये जा रहे हैं? एक तथ्य जो सबको पता है वह है दिल्ली में वाहनों की संख्या और उसकी तादात में लगातार हो रही वृद्धि। दशकों से यह बात सरकार और समाज सबको मालूम है लेकिन इसको लेकर दोनों उदासीन बने हुये हैं। न तो सरकार इस समस्या को लेकर गंभीर दिखती है और न ही समाज। जब भी समय-समय पर इस तरह की रिपोर्टें सामने आती हैं बहस शुरु हो जाती है लेकिन उसपर कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता है। हलांकि राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने दिल्ली में 15 साल पुराने वाहनों को प्रतिबंधित करने की बात कही है। विशेषज्ञों का भी ऐसा ही मानना है। परंतु अभी यह सिर्फ बात ही है। इस फैसले को अमल में लाने के लिये सरकार तत्परता नहीं दिख रही है। यह सच है कि यदि दिल्ली में सिर्फ वाहनों की अंधाधुंध वृद्धि पर काबू पा लिया जाय तो काफी हद तक इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। अपने तौर पर समाज को भी यह सोचना होगा कि हम वायु प्रदूषण रोकने के लिये क्या कर सकते हैं। क्योंकि अंतत: इसके परिणाम समाज को ही भुगतना पड़ता है।

– कृष्ण ध्यान त्रिपाठी

mariah carey without makeup