आतंक का जहर, ममता की खिसियाहट

आतंक का जहर

इसमें कोई दो राय नहीं कि आतंकवाद से पूरी दुनिया त्रस्त है। गत सप्ताह दो ऐसी आतंकी घटना हुई जिसने पूरी दुनिया को एक बार फिर झकझोर कर रख दिया। पहली घटना सिडनी में हुई अभी दुनिया की नजर इस तरफ थी तभी दूसरी घटना पाकिस्तान में हुई जिसने सबको स्तब्ध कर दिया। सिडनी में जिस तरह से आतंकवादियों ने लोगों को बंधक बनाया और पाकिस्तान में जिस तरह से मासूम बच्चों के साथ दरिंदगी की गई उसकी जितनी भी निंदा की जाय वह कम है। यह दोनों घटनायें एक बार फिर यह बताती हैं कि वैश्विक आतंकवाद का खतरा उससे कहीं ज्यादा बड़ा है, जितना कि अक्सर उसे माना जाता है। परंतु दोनों देशों की घटनाओं में एक अंतर है। वह यह है कि आस्ट्रेलिया की कानून-व्यवस्था का तंत्र और खुफिया मशीनरी काफी अच्छी मानी जाती है, लेकिन पाकिस्तान के बारे में ऐसा कतई नहीं कहा जा सकता। भारत एक ऐसा देश है जो आतंकवाद का दंश कई दशकों से भुगत रहा है। समय-समय पर भारत वैश्विक मंच पर यह बात पुरजोर तरीके से उठाता रहा है कि आतंकवाद से निपटने के लिये पूरे विश्व को एक साथ आना चाहिये। लेकिन किसी न किसी कारण से आतंकवाद से प्रभावित देश एक साथ मिलकर इससे नहीं लड़ते, बल्कि सब अलग-अलग राग अलाप रहे होते हैं। सिडनी जैसी कोई घटना जब भारत जैसे देश में घटती है, तब आदतन विशेषज्ञ सरकार और प्रशासन को दोष देते हैं। कहा जाता है कि हम आतंकी वारदात हो चुकने के बाद उससे निपटने के लिए सक्रिय होते हैं, और ऐसा कुछ नहीं कर पाते कि ऐसी घटनाएं हों ही न। यह बताया जाता है कि सरकार को प्रो-ऐक्टिव होना चाहिए। उसे ऐसे तत्वों से निपटने के आधुनिक तरीके अपनाने चाहिए। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि सरकार और प्रशासन में कमियां नहीं हैं। परंतु सिडनी की घटना ने यह साफ कर दिया है कि ऐसे तर्कों में दम नहीं है। अब यदि पाकिस्तान में हुई घटना पर नजर डालें तो यह कहना गलत न होगा कि पाकिस्तान वही फसल काट रहा है जिसके बीज उसने बोये हैं। जेहाद के नाम पर मासूम बच्चों की हत्या ऐसा कायराना कारनामा सिर्फ पाकिस्तान में ही हो सकता है। इस कुकृत्य के लिये यदि कोई एकमात्र दोषी है तो वह है पाकिस्तान की आइएसआइ और सरकार। पाकिस्तान के इस दोनों तंत्रों ने ही आतंकियों को बनाया है और उनको शरण दी है। मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड को अब तक पाकिस्तान की सरकार ने दोषी नहीं माना है। बल्कि उसको तो पाकिस्तान सरकार संरक्षण भी दे रही है। पाकिस्तान का यही दोहरापन आज उसके सामने खड़ा है। जिन जेहादियों को उसने पनपने दिया उनमें से कुछ आज पाकिस्तान को ही सबक सिखाने पर तुले हैं। इस मसले पर पूरे विश्व को निष्पक्ष एकजुटता दिखानी होगी तभी इसका खात्मा किया जा सकेगा।

– गुरमीत सिंह

ममता की खिसियाहट

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन दिनों काफी गुस्से में हैं, उनके गुस्से का मुख्य कारण है शारदा चिट फंड घोटाले में उनके विश्वासपात्र मंत्रिमंडलीय सहयोगी मदन मित्रा की सीबीआई के हाथों गिरफ्तारी। देखा जाय तो उनके गुस्से में एक तरह की खिसियाहट भी नजर आती है। उनके क्रोध या खिसियाहट का आलम यह है कि वह जो बोल रही हैं वह एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिये अशोभनीय है। इन सबके बीच ममता बनर्जी यह भी भूल रही हैं कि सीबीआई की जांच वर्तमान सरकार के आने के बाद नहीं, अपितु उसके पहले से ही चल रही है। और इससे पहले की वही सरकार थी जिसको लगभग सात आठ सालों तक उनकी पार्टी ने सिर्फ समर्थन दिया था बल्कि वह उसका हिस्सा भी थी। ममता का वर्तमान सरकार के साथ राजनीतिक विरोध हो सकता है। लोकतंत्र में ऐसा होना भी चाहिये। परंतु इसका यह मतलब कतई नहीं कि शिष्टाचार की मर्यादायें लांघी जांय। दुर्भाग्य से शारदा चिट फंड घोटाले के मामले में ऐसा ही किया जा रहा है। मदन मित्रा यदि निर्दोष हैं तो उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन यदि वह दोषी हैं तो निश्चित रुप से उनको बचाने की कोशिश नहीं होनी चाहिये। ममता बनर्जी का यह कह देना कि सीबीआई ने मदन मित्रा को अरेस्ट करने में नियमों की अनदेखी की है, गले नहीं उतरती। सवाल यह उठता है कि यदि तृणमूल कांग्रेस को यह विश्वास है कि गिरफ्तारी में नियमों की अनदेखी हुई है तो वह न्यायालय का दरवाजा क्यों नहीं खटखटाती? यहीं यह सवाल उत्पन्न होता है कि दाल में कुछ काला जरुर है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने एक घोटाले के आरोपी का बचाव करने में यह भी भुला दिया कि वे एक संवैधानिक पद पर बैठी हुई हैं, जिसकी अपनी एक गरिमा होती है। यह एक सच है कि शारदा घोटाले की जांच सर्वोच्च न्यायालय के देख रेख में चल रही है। इस घोटले में कौन सा आरोपी दोषी है और कौन सा निर्दोष यह फैसला न्यायालय करेगा न कि ममता। लेकिन वह तो कुछ भी न मानने पर आमदा हैं, अभी से फैसला सुनाने में लग गई हैं। उन्हें इस बात का भी अहसास नहीं है कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी के ऊपर गैर जिम्मेदाराना टिप्पणी करने का कितना गलत संदेश जा सकता है। इस मुद्दे वह जिस तरह से शोर मचा रही हैं उससे यह शक और गहरा होता जा रहा है कि कहीं वह भी तो इस घोटले में शामिल नहीं?

– कृष्ण ध्यान त्रिपाठी

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